स्वतन्त्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा (29 सितम्बर/बलिदान दिवस)

1942 में जब ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ ने जोर पकड़ा, तो मातंगिनी उसमें कूद पड़ीं। आठ सितम्बर को तामलुक में हुए एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से तीन स्वाधीनता सेनानी मारे गये। लोगों ने इस के विरोध में 29 सितम्बर को और भी बड़ी रैली निकालने का निश्चय किया। मातंगिनी ने गाँव-गाँव में घूमकर रैली के लिए 5,000 लोगों को तैयार किया। सब के सब दोपहर में सरकारी डाक बंगले पर पहुँच गये। *तभी पुलिस की बन्दूकें गरज उठीं। मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़ी हो कर नारे लगवा रही थीं। एक गोली उनके बायें हाथ में लगी। उन्होंने तिरंगे झण्डे* को गिरने से पहले ही दूसरे हाथ में ले लिया। तभी दूसरी गोली उनके दाहिने हाथ में और तीसरी उनके माथे पर लगी। *मातंगिनी की मृत देह वहीं लुढ़क गयी।* इस बलिदान से पूरे क्षेत्र में इतना जोश उमड़ा कि दस दिन में ही लोगों ने अंग्रेजों को खदेड़कर वहाँ *स्वाधीन सरकार स्थापित कर दी, जिसने 21 महीने तक काम किया।* दिसम्बर,1974 में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने अपने प्रवास के समय तामलुक में मांतगिनी हाजरा की मूर्ति का अनावरण कर उन्हें अपने *श्रद्धासुमन* अर्पित किये।

स्वतन्त्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा (29 सितम्बर/बलिदान दिवस) भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में पुरुषों के साथ - साथ महिलाओं ने भी कदम से कदम मिला कर संघर्ष किया था। *मातंगिनी हाजरा एक ऐसी ही बलिदानी माँ थीं, जिन्होंने अपनी अशिक्षा, वृद्धावस्था तथा निर्धनता को इस संघर्ष में आड़े नहीं आने दिया।* मातंगिनी का जन्म 1870 में ग्राम होगला, जिला मिदनापुर, पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में एक अत्यन्त निर्धन परिवार में हुआ था। *गरीबी के कारण 12 वर्ष की अवस्था में ही उनका विवाह ग्राम अलीनान के 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया; पर दुर्भाग्य उनके पीछे पड़ा था। छह वर्ष बाद वह निःसन्तान विधवा हो गयीं।* पति की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र उससे बहुत घृणा करता था। *अतः मातंगिनी एक अलग झोपड़ी में रह कर मजदूरी से जीवनयापन करने लगी।* गाँव वालों के दुःख-सुख में सदा सहभागी रहने के कारण वे पूरे गाँव में माँ के समान पूज्य हो गयीं। 1932 में गाँधी जी के नेतृत्व में देश भर में स्वाधीनता आन्दोलन चला। *वन्देमातरम् का घोष करते हुए जुलूस प्रतिदिन निकलते थे।* जब ऐसा एक जुलूस मातंगिनी के घर के पास से निकला, तो उसने बंगाली परम्परा के अनुसार *शंख ध्वनि से उसका स्वागत किया और जुलूस के साथ चल दी।* तामलुक के कृष्णगंज बाजार में पहुँचकर एक सभा हुई। *वहाँ मातंगिनी ने सबके साथ स्वाधीनता संग्राम में तन, मन, धन पूर्वक संघर्ष करने की शपथ ली।* मातंगिनी को अफीम की लत थी; *पर अब इसके बदले उनके सिर पर स्वाधीनता का नशा सवार हो गया।* 17 जनवरी, 1933 को ‘कर बन्दी आन्दोलन’ को दबाने के लिए बंगाल के तत्कालीन गवर्नर एण्डरसन तामलुक आये, तो उनके विरोध में प्रदर्शन हुआ। *वीरांगना मातंगिनी हाजरा सबसे आगे काला झण्डा लिये डटी थीं।* वह ब्रिटिश शासन के विरोध में नारे लगाते हुई दरबार तक पहुँच गयीं। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, *और छह माह का सश्रम कारावास देकर मुर्शिदाबाद जेल में बन्द कर दिया।* 1935 में तामलुक क्षेत्र भीषण बाढ़ के कारण हैजा और चेचक की चपेट में आ गया। *मातंगिनी अपनी जान की चिन्ता किये बिना, राहत कार्य में जुट गयीं।*

1942 में जब ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ ने जोर पकड़ा, तो मातंगिनी उसमें कूद पड़ीं। आठ सितम्बर को तामलुक में हुए एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से तीन स्वाधीनता सेनानी मारे गये। लोगों ने इस के विरोध में 29 सितम्बर को और भी बड़ी रैली निकालने का निश्चय किया। मातंगिनी ने गाँव-गाँव में घूमकर रैली के लिए 5,000 लोगों को तैयार किया। सब के सब दोपहर में सरकारी डाक बंगले पर पहुँच गये। *तभी पुलिस की बन्दूकें गरज उठीं। मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़ी हो कर नारे लगवा रही थीं। एक गोली उनके बायें हाथ में लगी। उन्होंने तिरंगे झण्डे* को गिरने से पहले ही दूसरे हाथ में ले लिया। तभी दूसरी गोली उनके दाहिने हाथ में और तीसरी उनके माथे पर लगी। *मातंगिनी की मृत देह वहीं लुढ़क गयी।* इस बलिदान से पूरे क्षेत्र में इतना जोश उमड़ा कि दस दिन में ही लोगों ने अंग्रेजों को खदेड़कर वहाँ *स्वाधीन सरकार स्थापित कर दी, जिसने 21 महीने तक काम किया।* दिसम्बर,1974 में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने अपने प्रवास के समय तामलुक में मांतगिनी हाजरा की मूर्ति का अनावरण कर उन्हें अपने *श्रद्धासुमन* अर्पित किये।

Pradip Goyel

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